पश्चिम एशिया की तपिश अब उस मुकाम पर है जहां एक भी गलत कदम पूरे क्षेत्र को ऐसी आग में झोंक सकता है जिसे बुझाना नामुमकिन होगा। ईरान ने हाल ही में अमेरिका और इजरायल को जो अल्टीमेटम दिया है, वो सिर्फ एक कूटनीतिक बयान नहीं है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि तेहरान अब अपनी रणनीतिक सहनशीलता की सीमा पार कर चुका है। ईरान के सर्वोच्च नेता और सैन्य कमांडरों ने साफ कर दिया है कि उनका देश 'पक्का इरादा' कर चुका है। इसका मतलब सीधा है। अगर इजरायल ने ईरानी हितों या उसकी संप्रभुता पर चोट की, तो जवाब पहले से कहीं ज्यादा घातक होगा। यह स्थिति दुनिया के लिए चिंताजनक है क्योंकि यह सिर्फ दो देशों की जंग नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रहार है।
ईरान का यह कड़ा रुख तब आया जब सीरिया में उसके वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ और उसके बाद लेबनान से लेकर यमन तक तनाव बढ़ गया। लोग अक्सर पूछते हैं कि क्या ईरान वाकई सीधे युद्ध में कूदेगा? सच तो ये है कि ईरान कभी भी सीधा युद्ध नहीं चाहता, लेकिन वह अपनी 'प्रॉक्सिमिटी' और क्षेत्रीय प्रभाव को कम होते भी नहीं देख सकता। जब तेहरान कहता है कि वह तैयार है, तो वह अपने बैलिस्टिक मिसाइल भंडार और उन ड्रोन्स की बात कर रहा है जिन्होंने हाल के वर्षों में अपनी मारक क्षमता साबित की है।
अमेरिका की मुश्किल और इजरायल की जिद
अमेरिका इस समय दो पाटों के बीच फंसा है। एक तरफ उसे अपने सबसे करीबी सहयोगी इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। दूसरी तरफ, वह किसी भी हाल में एक और क्षेत्रीय युद्ध में नहीं उलझना चाहता। वाशिंगटन जानता है कि अगर ईरान के साथ सीधी भिड़ंत हुई, तो खाड़ी देशों में मौजूद उसके सैन्य ठिकाने और तेल की सप्लाई लाइनें सबसे पहले निशाने पर होंगी। जो बाइडन प्रशासन की कोशिश है कि इजरायल को संयम बरतने के लिए मनाया जाए, लेकिन बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता करने के मूड में नहीं दिखती।
इजरायल का तर्क सीधा है। उनका कहना है कि अगर वे अभी ईरान के सहयोगियों (हिजबुल्लाह और हमास) को खत्म नहीं करते, तो भविष्य में खतरा और बढ़ेगा। लेकिन क्या यह मुमकिन है? इतिहास गवाह है कि सैन्य ताकत से किसी विचारधारा या रेजिस्टेंस ग्रुप को पूरी तरह खत्म करना लगभग नामुमकिन रहा है। इजरायल की कार्रवाई जितनी तेज हो रही है, ईरान का लहजा उतना ही सख्त होता जा रहा है। तेहरान ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश भेजा है कि वह इस लड़ाई से दूर रहे, वरना इलाके में अमेरिकी फौज सुरक्षित नहीं रहेगी।
तेल की कीमतें और वैश्विक संकट
दुनिया भर के बाजारों की नजरें होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर टिकी हैं। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन बिंदु है। ईरान ने कई बार संकेत दिया है कि अगर उसे कोने में धकेला गया, तो वह इस रास्ते को बंद कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो कच्चे तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा। हमारी अर्थव्यवस्था तेल आयात पर टिकी है और महंगाई का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।
ईरान का अल्टीमेटम दरअसल एक मनोवैज्ञानिक युद्ध भी है। वह बताना चाहता है कि उसके पास खोने के लिए कम और पाने के लिए बहुत कुछ है। उसकी सैन्य क्षमताएं पिछले एक दशक में काफी विकसित हुई हैं। उसके पास ऐसे अंडरग्राउंड 'मिसाइल सिटी' हैं जिन्हें नष्ट करना किसी भी वायुसेना के लिए बड़ी चुनौती है। इजरायल के पास दुनिया का बेहतरीन डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' और 'एरो' है, लेकिन क्या वे हजारों मिसाइलों के एक साथ होने वाले हमले को झेल पाएंगे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब कोई भी टेस्ट नहीं करना चाहता।
रूस और चीन का मौन समर्थन
इस पूरे विवाद में रूस और चीन की भूमिका को नजरअंदाज करना बेवकूफी होगी। ईरान के रूस के साथ बढ़ते सैन्य संबंध और चीन के साथ उसका आर्थिक समझौता उसे पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। रूस को यूक्रेन युद्ध के बीच ईरान से मिलने वाले ड्रोन्स की जरूरत है, वहीं चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ईरान पर निर्भर है। ये दोनों महाशक्तियां कभी नहीं चाहेंगी कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो या उस पर कोई बड़ा हमला हो।
अमेरिका के लिए असली चुनौती यही है। वह ईरान पर दबाव तो बनाना चाहता है, लेकिन वह उसे पूरी तरह अलग-थलग नहीं कर पा रहा। ईरान ने अपनी अर्थव्यवस्था को 'प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था' (Resistance Economy) के रूप में ढाल लिया है। सालों के प्रतिबंधों ने उसे आत्मनिर्भर तो नहीं बनाया, पर उसे टूटने से भी बचा लिया है। आज का ईरान 1980 के दशक का ईरान नहीं है। उसके पास तकनीक है, क्षेत्रीय पहुंच है और सबसे बड़ी बात, उसके पास लड़ने का पक्का इरादा है।
क्या कूटनीति का रास्ता बंद हो चुका है
अक्सर लोग सोचते हैं कि जब सेनाएं आमने-सामने हों, तो बातचीत की गुंजाइश खत्म हो जाती है। लेकिन हकीकत में, पर्दे के पीछे हमेशा बातचीत चलती रहती है। कतर और ओमान जैसे देश अक्सर बिचौलिए की भूमिका निभाते हैं। ईरान का अल्टीमेटम दरअसल अपनी शर्तों पर बातचीत करने का एक तरीका भी हो सकता है। वह दुनिया को बताना चाहता है कि उसे हल्के में न लिया जाए। अगर इजरायल गाजा या लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई को एक निश्चित सीमा से आगे ले जाता है, तो ईरान को मजबूरन हस्तक्षेप करना पड़ेगा ताकि उसका क्षेत्रीय दबदबा बना रहे।
हमें यह समझना होगा कि ईरान की धमकियां सिर्फ खोखली नहीं होतीं। जब उन्होंने जनरल सुलेमानी की मौत के बाद इराक में अमेरिकी बेस पर मिसाइलें दागी थीं, तो उन्होंने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था। वे सीधे टकराव से बचते हैं, लेकिन जब बात अस्तित्व की आती है, तो वे पीछे नहीं हटते। अमेरिका इस बात को अच्छी तरह समझता है, इसीलिए उसके बयानों में एक तरह की सावधानी नजर आती है।
पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीद फिलहाल धुंधली दिख रही है। ईरान ने जो पक्का इरादा जताया है, वह इस बात का सबूत है कि आने वाले दिन और भी चुनौतीपूर्ण होंगे। अब गेंद इजरायल और अमेरिका के पाले में है। क्या वे इस तनाव को कम करने के लिए कोई रास्ता निकालेंगे या फिर एक बड़े टकराव की ओर बढ़ेंगे? इसका फैसला आने वाले कुछ हफ्तों में हो जाएगा।
क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए अब केवल बयानों से काम नहीं चलेगा। ठोस कूटनीतिक पहल की जरूरत है। अगर आप इस भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं, तो केवल खबरों की हेडलाइंस न देखें। जमीन पर बदलती सैन्य तैनाती और राजनयिकों की गुपचुप मुलाकातों को ट्रैक करना शुरू करें। यही वे संकेत हैं जो बताएंगे कि युद्ध शुरू होगा या टलेगा। खाड़ी देशों के शेयर बाजारों और तेल की कीमतों पर नजर रखना भी एक समझदारी भरा कदम होगा क्योंकि बाजार हमेशा राजनीति से दो कदम आगे चलता है।