डोनाल्ड ट्रंप फिर से चर्चा में हैं। इस बार वजह कोई चुनावी रैली या ट्वीट नहीं बल्कि एक चौंकाने वाली रिपोर्ट है। खबर ये है कि ट्रंप इसी साल मार्च में ईरान के साथ सीजफायर यानी युद्धविराम की कोशिश कर रहे थे। ये बात उन लोगों को हजम नहीं हो रही जो ट्रंप को ईरान का सबसे बड़ा दुश्मन मानते आए हैं। आखिर वो नेता जिसने ईरान के सबसे ताकतवर जनरल कासिम सुलेमानी को मारने का आदेश दिया था, वो अचानक शांति की बात क्यों करने लगा?
ये सिर्फ एक खबर नहीं है। ये ग्लोबल पॉलिटिक्स की उस बिसात का हिस्सा है जिसे हम अक्सर टीवी डिबेट्स में नहीं देख पाते। रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप प्रशासन के पर्दे के पीछे ईरान के साथ बातचीत के रास्ते खोलने की छटपटाहट थी। वो चाहते थे कि राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी तेज होने से पहले मिडिल ईस्ट का ये सिरदर्द कम से कम कागजों पर शांत हो जाए। पर क्या ये इतना आसान था? बिल्कुल नहीं। In related developments, take a look at: The Hollow Echo of a Locked Gate.
ट्रंप और ईरान के रिश्तों की उलझी हुई कहानी
ट्रंप की ईरान पॉलिसी हमेशा से 'मैक्सिमम प्रेशर' वाली रही है। उन्होंने 2015 की न्यूक्लियर डील को कचरे के डिब्बे में डाल दिया था। उन पर आरोप लगे कि वो युद्ध चाहते हैं। लेकिन असलियत थोड़ी अलग दिखती है। ट्रंप असल में एक 'डील मेकर' हैं। वो चाहते थे कि ईरान घुटनों पर आए और फिर वो अपनी शर्तों पर एक नई संधि करें जिसे वो दुनिया को अपनी जीत के तौर पर दिखा सकें।
मार्च 2026 की इस रिपोर्ट के पीछे की टाइमिंग को समझना जरूरी है। अमेरिका में चुनाव करीब हैं। ट्रंप जानते हैं कि अगर वो एक और युद्ध की आहट के साथ चुनाव में उतरते हैं, तो मिडिल ईस्ट में फंसे अमेरिकी सैनिकों का मुद्दा उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए उन्होंने एक अलग रास्ता चुना। वो चाहते थे कि मार्च के महीने में ही ईरान के साथ एक ऐसी सहमति बन जाए जिससे सीमा पर जारी तनाव और छिटपुट हमले रुक जाएं। NBC News has also covered this fascinating subject in extensive detail.
सीजफायर की कोशिशों के पीछे का असली खेल
ईरान के साथ सीजफायर का मतलब सिर्फ गोलियां रुकना नहीं था। इसके पीछे कई बड़े कारण थे। सबसे पहला कारण तेल की कीमतें थीं। मिडिल ईस्ट में तनाव का सीधा असर आपकी और हमारी जेब पर पड़ता है। अगर ईरान और इजरायल या अमेरिका के बीच सीधा टकराव होता, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगतीं। ट्रंप ये कभी नहीं चाहते थे।
दूसरा बड़ा कारण इजरायल की सुरक्षा और गाजा में चल रहा संकट है। ईरान समर्थित गुट लगातार इजरायल को निशाना बना रहे हैं। ट्रंप को लगा कि अगर वो ईरान के साथ डायरेक्ट सीजफायर की बात करते हैं, तो वो इन प्रॉक्सी ग्रुप्स को शांत कर सकते हैं। इससे उन्हें एक 'पीसमेकर' की इमेज मिलती। ये एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता था, लेकिन तेहरान के तेवर कुछ और ही थे।
ईरान ने हमेशा से शर्त रखी है कि जब तक उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटाए जाते, वो किसी भी तरह की मेज पर नहीं बैठेगा। ट्रंप की टीम ने कुछ रियायतों का लालच भी दिया, मगर बात बनी नहीं।
क्या ये महज एक चुनावी स्टंट था
ईमानदारी से कहूं तो राजनीति में कुछ भी निस्वार्थ नहीं होता। ट्रंप की इस कोशिश को कई एक्सपर्ट्स महज एक दिखावा मानते हैं। उनका तर्क है कि ट्रंप दिखाना चाहते थे कि जो काम जो बाइडन नहीं कर पाए, वो उन्होंने पर्दे के पीछे से कर दिखाया। रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में कई दौर की गुप्त बातचीत हुई। इसमें ओमान और कतर जैसे देशों ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
लेकिन यहाँ एक पेंच है। ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई को ट्रंप पर भरोसा नहीं है। उन्हें लगता है कि ट्रंप आज समझौता करेंगे और कल फिर से प्रतिबंध लगा देंगे। इसी अविश्वास ने मार्च वाले उस संभावित सीजफायर को धरातल पर आने से रोक दिया। ट्रंप की टीम ने दावा किया था कि वो एक 'ग्रैंड डील' के करीब हैं, पर ईरान की तरफ से चुप्पी ही मिली।
मिडिल ईस्ट की अस्थिरता और ट्रंप का प्रभाव
अगर आप नक्शे को देखें तो ईरान सिर्फ एक देश नहीं है। उसका प्रभाव यमन से लेकर लेबनान और इराक तक फैला है। ट्रंप ने अपनी पिछली पारी में अब्राहम एकॉर्ड्स (Abraham Accords) के जरिए अरब देशों और इजरायल को करीब लाने का काम किया था। वो चाहते थे कि इस बार ईरान को भी इसी तरह के किसी फ्रेमवर्क में लाया जाए।
मार्च में जो कोशिश हुई, उसमें ये बात भी शामिल थी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को एक निश्चित स्तर से आगे नहीं बढ़ाएगा। बदले में अमेरिका उसे कुछ अरब डॉलर के फ्रीज किए गए फंड्स तक पहुंच दे सकता था। ये सौदा सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन अमेरिका के भीतर भी इसका विरोध था। कई रिपब्लिकन नेता ईरान को जरा भी ढील देने के खिलाफ थे।
हम इस रिपोर्ट से क्या सीख सकते हैं
ये खुलासा हमें बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्त और दुश्मन स्थायी नहीं होते। जो ट्रंप कल तक ईरान को तबाह करने की धमकी दे रहे थे, वही आज उसके साथ चाय की मेज पर बैठने को तैयार थे। ये 'आर्ट ऑफ द डील' का ही एक हिस्सा है, जहाँ फायदा सबसे ऊपर होता है।
ईरान के साथ सीजफायर न हो पाना सिर्फ ट्रंप की नाकामी नहीं है। ये दिखाता है कि मिडिल ईस्ट की गुत्थी कितनी उलझी हुई है। वहां सिर्फ दो देश नहीं लड़ रहे, बल्कि दशकों पुरानी विचारधाराओं की जंग है। ट्रंप को लगा कि वो बिजनेस डील की तरह इसे सुलझा लेंगे, पर हकीकत कुछ और ही निकली।
अब जबकि ये रिपोर्ट बाहर आ चुकी है, तो आने वाले समय में ईरान-अमेरिका संबंधों में और कड़वाहट दिख सकती है। या फिर ये भी हो सकता है कि ये लीक जानबूझकर की गई हो ताकि ये संदेश जाए कि ट्रंप शांति के लिए कोशिश कर रहे थे और ईरान ने ही हाथ पीछे खींच लिए।
अगर आप इस पूरे घटनाक्रम को करीब से देख रहे हैं, तो कुछ बातें साफ हैं। पहली ये कि ईरान को हल्के में नहीं लिया जा सकता। दूसरी ये कि ट्रंप की विदेश नीति उतनी सीधी नहीं है जितनी वो रैलियों में बताते हैं। तीसरी और सबसे अहम बात, मार्च का वो महीना इतिहास में एक ऐसे मौके के तौर पर दर्ज हो गया जो 'होते-होते रह गया'।
आगे क्या होगा? नजर रखिए उन देशों पर जो ईरान के करीब हैं। चीन और रूस का रुख भी इस पूरी कहानी में अहम मोड़ ला सकता है। फिलहाल तो यही सच है कि ट्रंप का वो सीक्रेट मिशन अधूरा रह गया और मिडिल ईस्ट की आग ठंडी होने के बजाय और धधक रही है। आपको क्या लगता है? क्या ट्रंप वाकई ईरान के साथ शांति चाहते थे या ये सिर्फ वोट बटोरने का एक और तरीका था? जमीनी हकीकत तो यही है कि बिना भरोसे के कोई भी सीजफायर ज्यादा दिन नहीं टिकता।