पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सुरक्षा बलों पर एक और बड़ा हमला हुआ है। इस बार आतंकियों ने सीधे सेना के ठिकाने को निशाना बनाया। शुरुआती खबरों के मुताबिक इस भीषण भिड़ंत में कम से कम 15 सैनिकों की जान चली गई है। ये कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ महीनों में इस तरह के हमलों की फ्रीक्वेंसी डराने वाली हद तक बढ़ गई है। अगर आप सोच रहे हैं कि ये सिर्फ एक सामान्य आतंकी घटना है, तो आप गलत हैं। ये पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के पूरी तरह चरमरा जाने का सबूत है।
आतंकियों ने हमले के लिए आधी रात का समय चुना। उन्होंने रॉकेट लॉन्चरों और ऑटोमैटिक हथियारों का इस्तेमाल किया। सेना की चेकपोस्ट पर तैनात जवानों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। पाकिस्तान में सेना की पकड़ हमेशा से मजबूत रही है, लेकिन अब उसी सेना के गढ़ में घुसकर आतंकी उन्हें चुनौती दे रहे हैं। ये हमला बताता है कि जमीनी हकीकत वैसी नहीं है जैसी सरकारी बयानों में दिखाई जाती है। सुरक्षा में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक हुई है। Expanding on this theme, you can also read: The OIF Succession Myth and the Death of Francophone Soft Power.
सीमावर्ती इलाकों में बढ़ता खूनी खेल
खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के इलाके अब जंग के मैदान बन चुके हैं। यहाँ तैनात सैनिकों के लिए हर दिन एक नई चुनौती है। ये हमला उस वक्त हुआ जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। आतंकियों को पता है कि ये सबसे सही समय है दबाव बनाने का। उन्होंने सेना के बुनियादी ढांचे को चोट पहुँचाई है। 15 जवानों की शहादत कोई मामूली बात नहीं है। ये संख्या और भी बढ़ सकती है क्योंकि कई घायल सैनिकों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है।
सैनिकों की मौत के बाद पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया गया है। भारी तादाद में अतिरिक्त कुमुक बुलाई गई है। लेकिन सच तो ये है कि पहाड़ियों और मुश्किल रास्तों का फायदा उठाकर आतंकी अक्सर गायब हो जाते हैं। स्थानीय लोग खौफ में हैं। उन्हें डर है कि इस ऑपरेशन के दौरान उन्हें भी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। पाकिस्तान सरकार ने हमेशा की तरह कड़े शब्दों में निंदा की है, पर सिर्फ शब्दों से बॉर्डर सुरक्षित नहीं होते। Observers at Al Jazeera have shared their thoughts on this trend.
खुफिया तंत्र की नाकामी और रणनीतिक चूक
इतने बड़े हमले की प्लानिंग रातों-रात नहीं होती। इसके लिए रेकी की गई होगी। हथियारों का इंतजाम हुआ होगा। सवाल ये उठता है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थीं? क्या उन्हें भनक तक नहीं लगी कि उनकी एक अहम चेकपोस्ट पर हमला होने वाला है? जब 15 सैनिक मारे जाते हैं, तो उसे सिर्फ 'मुठभेड़' कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। ये सीधे तौर पर इंटेलिजेंस का फेलियर है।
पाकिस्तानी सेना अक्सर दावा करती है कि उन्होंने आतंकवाद की कमर तोड़ दी है। ये दावे हवा-हवाई लगते हैं जब आप हर दूसरे हफ्ते ऐसी खबरें सुनते हैं। दरअसल, जिस सांप को उन्होंने पाल-पोसकर बड़ा किया, अब वही उन्हें डस रहा है। टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) जैसे संगठनों का प्रभाव इन इलाकों में फिर से बढ़ रहा है। उन्हें अफगान सीमा के पास से जो सपोर्ट मिलता है, उसे रोकना पाकिस्तान के लिए नामुमकिन सा हो गया है।
सैनिकों की शहादत और बिगड़ते हालात
मरने वाले सैनिकों में जूनियर अधिकारियों से लेकर जवान तक शामिल हैं। इनके परिवारों के लिए ये खबर किसी पहाड़ टूटने जैसी है। पाकिस्तान में इस वक्त गुस्सा और दुख दोनों है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक उनके जवान इस तरह मरते रहेंगे? सेना के प्रवक्ता ने कहा है कि आतंकवादियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन ये बयान अब घिसे-पिटे लगने लगे हैं। जनता अब नतीजों की उम्मीद कर रही है, खोखले वादों की नहीं।
इस हमले ने एक बार फिर ये साफ कर दिया है कि आतंकवाद किसी का सगा नहीं होता। जब तक पाकिस्तान अपनी "गुड टेररिस्ट" और "बैड टेररिस्ट" वाली नीति नहीं छोड़ेगा, तब तक उसके अपने जवान सुरक्षित नहीं रहेंगे। हिंसा का ये चक्र चलता रहेगा। 15 सैनिकों की मौत महज एक आंकड़ा नहीं है, ये उस खोखली सुरक्षा नीति का आईना है जो सालों से चली आ रही है।
क्या अब बदलेगी पाकिस्तान की रणनीति
अब सवाल ये है कि पाकिस्तान आगे क्या करेगा? क्या वो फिर से वही पुराना राग अलापेगा या वाकई में अपनी गलतियों को सुधारेगा? सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, तब तक ऐसे हमले होते रहेंगे। सेना को अपनी तकनीक और निगरानी के तरीकों में बड़े बदलाव करने की जरूरत है। पुराने ढर्रे पर चलकर आप आज के हाई-टेक आतंकियों से नहीं लड़ सकते।
आने वाले दिनों में हमें खैबर पख्तूनख्वा में और भी आक्रामक सैन्य कार्रवाई देखने को मिल सकती है। सेना अपना खोया हुआ रसूख वापस पाने की कोशिश करेगी। लेकिन इस सब के बीच आम नागरिक सबसे ज्यादा पिसता है। उसे आतंकियों का डर भी है और सेना की सख्ती का भी। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना सबसे ज्यादा जरूरी है, जो फिलहाल कहीं नजर नहीं आता।
अपनी सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान को अब गंभीरता से सोचना होगा। आप दुनिया को नहीं डरा सकते अगर आपके अपने घर में आग लगी हो। ये 15 सैनिक उसी आग की भेंट चढ़ गए हैं।